तुम्हारी बेवफाई सोच कर चहरे पे हस्सी बना लेते है,
भीड़ में भी अपने को अकेला बना लेते हैं,
जीते तो हम भी हंस-हंस के है,
लकिन तुम्हारे बिना जीने को मजबूरी बना लेते हैं।
तन्हायिओं में गम बहुत सत्ताता हैं ,
इसलिए शराब को साथी बना लेते हैं।
ये जिंदगी भी क्या क्या सवाल पूछती हैं,
जवाब देने को हम खुद ख़ुशी बना लेते हैं।
वो नज़रें भी क्या कमाल करती थीं,
रूखे हुए चहरे पे उस मुस्कान का वार करती थीं,
पल भर में ही रेत का किला बना लेते थें,
और पलक झपकते ही उसे गिरा देते थें।
सबके चहरे पे हस्सी देख, होंटों पे मुस्कान बना लेते हैं ;
डरता हूँ कि कहीं मेरी मायूसी किसी कि मुस्कान न छीन ले,
इसलिए नजरों से भावनाओं को प्रकट कर मेफिल रंगीन बना देते हैं।
मौकों पर तो लोग मुझे बहुत पसंद करते हैं,
लेकिन मौकों पर ही मुझे तन्हाई का एहसास दिला देते हैं।
सबको खूब समझता हूँ और समझाता हूँ,
लेकिन खुद को समझाने के लिए तन्हाई के सागर में छलाँग लगा देता हूँ।
– गौरव।